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अजमेर. सारे विश्व में फैला अजमेर का प्रकाश और यहां की स्थापत्य कला के बेजोड़ नजारों से अलग व अनूठी दुनिया का अनदेखा नजारा है तारागढ़ की दरगाह पर हजारों साल पुरानी घोड़े की मजार, जहां सिर्फ लाल चादर आैर चने की दाल चढ़ती है। यहीं वर्षभर फल-फूल देने वाला गोंदी का हरा-भरा पेड़ भी है। कहते हैं कि इसके फल से बेऔलाद को आैलाद नसीब होती है। मीरा साहब की मजार पर चढ़ी मेहंदी विवाह की रुकावटें दूर करती हैं।शहर के सबसे ऊंची चोटी तारागढ़ पर हजरत मीरा साहब की दरगाह पर हजारों साल पुरानी घोड़े की मजार पर आज तक चने की दाल चढ़ती है, इस दाल का लंगर बनता है आैर जायरीन में बंटता है। यहीं एक गोंदी का पेड़ है, कहा जाता है कि जिसके आैलाद नहीं होती, वो इस पेड़ के फल को ले जाए तो समझिए उसकी मन्नत हो गई पूरी। मजार की मेहंदी का रंग भी ऐसे चढ़ता है कि विवाह में आ रही रुकावटें खुद-ब-खुद दूर होते चली जाती हैं। यह विश्व की इकलौती ऐसी दरगाह है जहां 12000 शहीदों की मजारें हैं। यहीं मामू-भांजे का मजार भी है। मेहंदी तो रंग लाएगी… सैयद रमजान अली मशहदी बताते हैं कि मीरा साहब की मजार पर चढ़ी हिना (मेहंदी) में अदभुत चमत्कार है। मान्यता है कि जिनके विवाह में रुकावटें हैं, वो यह मेहंदी लगाने से दूर होती जाती है। घोड़ा नहीं फरिश्ता था खिंग मीरा साहब की दरगाह में जैसे ही आप प्रवेश करेंगे सबसे पहले घोड़े की मजार है। यह घोड़ा उनका था, कहा जाता है यह फरिश्ता था। मीरा साहब से गुफ्तगू करता था। खिदमतगार सैयद मदद अली बताते हैं कि यह हजरत मीरा साहब का ही हुक्म था कि उनसे पहले घोड़े की मजार बनाई जाए, पहले इसकी जियारत करें फिर मेरी चौखट चूमें।

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