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इंसानियत भाईचारे की मिसाल यूं तो सूफी संतों की बारगाहों में देखने को मिल ही जाती है। इसी तरह एक और इंसानियत भाईचारा का जीता जागता सबूत देखने को मिला सूफी संत हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह अजमेर शरीफ में। जहां बसंत त्यौहार का एक जलसा मुनअक़िद किया गया। दरगाह के शाही कव्वालो की जानिब से हज़रत अमीर खुसरो की रस्म को ख्वाजा साहब की दरगाह में अदा किया गया। जहा रंगबिरंगे सरसों के फुल के साथ कई गुलाब के फूल कव्वाली के साथ दरगाह में पेश किये गए। इस रस्म ए बसंत में सभी मज़हब के अकिदत्मंदो ने शिरकत की और मुल्क में खुशहाली की दुआ माँगी।

हाथो में इश्क मोहब्बत और प्यार के रंगों में सज़ा गुलदस्ता , और हज़रत अमीर खुसरो की मनकबत से हज़रत ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैहि को मनाते दरगाह के शाही कव्वाल। ये खुबसूरत नज़ारा है अजमेर शरीफ का , जहा बसंत का जलसा मुनअक़िद किया गया। इस जलसे को अजमेर में शाही कव्वाल की जानिब से अदा किया जाता रहा है। ख़ास तौर पर इस जलसे में सरसों के फूलो का एक गुलदस्ता बनाया जाता है। जिसे हज़रत अमीर खुसरो के कलाम पढ़ कर हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज की बारगाह में पेश किया जाता है।

वीओ…ख्वाजा साहब की बारगाह में मनाई जाने वाली ये रस्म वैसे तो हिन्दू समाज में ही मनाई जाती है। मगर अजमेर में मनाई जाने वाली इस रस्म को महबूब -ऐ- इलाही हज़रत निजामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैहि और हज़रत अमीर खुसरो रहमतुल्लाह अलैहि से जोड़ कर देखा जाता है। कहा जाता है की महबूबे इलाही अपने भांजे के इंतकाल से कई दिनों तक रंजो गम में थे। एक दिन हज़रत अमीर खुसरो ने देखा की कुछ गैर मुस्लिम औरते अपने हाथो में सरसों के गुलदस्ते लिए गीत गाते जा रही थी। तब आपने किसी से मालुम किया की ये क्या माज़रा है तो जवाब मिला की ये सभी अपने देवी देवता को मनाने के लिए गुलदस्ता और नगमे गाती जा रही है।बस फिर क्या था हज़रत अमीर खुसरो ने भी सरसों के गुलदस्ते लेकर अपने पीर के नगमे गाना शुरू कर दिया।इस तमाम मामलात को देख कर हज़रत महबूबे इलाही भी मुस्कुरा दिए और उनके चहरे से रंजो गम की मायूसी दूर हो गई। तभी से इस रस्म को सूफी संतो की बारगाह में मनाया जाने लगा।

वीओ…बसंत की रस्म की अदाईगी के मौके पर दरगाह दीवान के फ़रज़न्द और खादिमो के साथ-साथ मुल्क के कोने -कोने से अजमेर पहुंचे जायरीन ने भी शिरकत की।ख्वाजा साहब की चोखट पर पहुंची बसंत ने अपनी खुश्बू से अकिदत को महका दिया , जिसकी महक अब हर रोज ख्वाजा साहब की चोखट पर सलाम करती रहेगी।

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